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जाने आखिर एक कन्या वृंदा कैसे बन गई तुलसी का पौधा, पूरी कहानी जान कर उड़ जायेंगे होश

ये तो सब जानते है कि हिन्दू धर्म में तुलसी का कितना ज्यादा महत्व है. जी हां न केवल धार्मिक रूप से बल्कि वैज्ञानिक रूप से भी तुलसी को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. बता दे कि तुलसी एक ऐसा पौधा है जिसे बेहद पवित्र माना जाता है. यही वजह है कि जिस घर में तुलसी का पौधा होता है, वहां इसकी पूजा जरूर की जाती है. अब यूँ तो आमतौर पर ज्यादातर हिन्दू घरो में तुलसी का पौधा जरूर लगाया है. मगर कई घरो में तुलसी के पौधे की सही तरीके से देखभाल न होने के कारण वहां इस पौधे को नहीं लगाया जाता.
गौरतलब है कि हिन्दू धर्म में भगवान् की पूजा के इलावा तुलसी पूजा का भी काफी विशेष महत्व होता है. आपकी जानकारी के लिए बता दे कि कार्तिक महीने की देवउठनी एकादशी का दिन तुलसी विवाह के उत्सव के रूप में मनाया जाता है. यानि धार्मिक शास्त्रों में इस दिन का काफी खास महत्व है. गौरतलब है कि चार महीने की लम्बी निंद्रा के बाद भगवान् विष्णु एकादशी के दिन ही जागते है.
यही वजह है कि इस दिन सभी देवी देवता मिल कर देव दीपावली मनाते है. बता दे कि इस दिन भगवान् विष्णु की सबसे प्रिय तुलसी का विवाह भी भगवान् शालिग्राम से होता है. अब ये तो सब को मालूम ही है कि भगवान् विष्णु को तुलसी कितनी ज्यादा प्रिय है. वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दे कि तुलसी का एक और नाम वृंदा भी है. बरहलाल आज हम आपको बताएंगे कि आखिर वृंदा वास्तव में तुलसी कैसे बनी.

जाने वृंदा से तुलसी बनने की कहानी..

अगर पौराणिक मान्यताओं की माने तो राक्षस कुल में ही एक कन्या का जन्म हुआ था. जिसका नाम वृंदा था. गौरतलब है कि यह कन्या बचपन से ही भगवान् विष्णु की भक्ति में पूरी तरह से मग्न रहती थी. वही जब वृंदा विवाह के योग्य हुई, तब उसके माता पिता ने उसका विवाह समुन्द्र मंथन से पैदा हुए जलंधर नाम के राक्षस से कर दिया. बता दे कि वृंदा भगवान् विष्णु की भक्त होने के साथ साथ एक पतिव्रता स्त्री भी थी. जिसके कारण वृंदा का पति धीरे धीरे और भी ज्यादा शक्तिशाली बन गया. यही वजह है कि तब सभी देवी देवता भी उसके कहर से डरने लगे थे.
गौरतलब है कि जलंधर जब भी किसी युद्ध के लिए जाता था, तब वृंदा भी पूजा अनुष्ठान के लिए बैठ जाती थी. दरअसल वृंदा की विष्णु भक्ति और साधना के कारण ही कोई भी जलंधर को युद्ध में हरा नहीं पाता था. बरहलाल एक दिन जलंधर ने देवताओ पर ही चढ़ाई कर दी. ऐसे में सभी देवता जलंधर को हराने में असफल रहे. जिसके चलते सभी देवता भगवान् विष्णु की शरण में गए और जलंधर को खत्म करने का आग्रह किया. बता दे कि इसके बाद भगवान् विष्णु ने अपनी माया से खुद ही जलंधर का रूप धारण कर लिया.
जी हां इसके बाद भगवान् विष्णु ने छल कर वृंदा के पतिव्रता धर्म को नष्ट कर दिया. जिसके कारण जलंधर की शक्ति कम होती चली गई और फिर वह युद्ध में मारा गया. आपको जान कर हैरानी होगी कि जब वृंदा को भगवान् विष्णु के छल के बारे में पता चला तो वृंदा ने विष्णु जी को शिला यानि पत्थर बनने का श्राप दे दिया. ऐसे में जब माँ लक्ष्मी जी ने वृंदा से विनती की तो वृंदा ने अपना श्राप वापिस ले लिया. इसके बाद वृंदा खुद भी जलंधर के साथ सती हो गई. बरहलाल ऐसा कहा जाता है कि जब वृंदा सती हुई, तब उसके शरीर की भस्म से ही एक पौधा निकला था. बता दे कि इस पौधे को ही भगवान् विष्णु ने तुलसी का नाम दिया था.
इसके साथ ही विष्णु जी ने खुद के एक रूप को पत्थर में समाहित करते हुए कहा कि आज से वह तुलसी के बिना कोई भी प्रसाद स्वीकार नहीं करेंगे. यही वजह है कि जब विष्णु जी को भोग लगाया जाता है, तब उसमे तुलसी का पत्ता जरूर डाला जाता है. इसके साथ ही विष्णु जी ने कहा कि इस पत्थर को शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जाएगा. यही वजह है कि कार्तिक के महीने में शालिग्राम का विवाह तुलसी जी के साथ किया जाता है.

बरहलाल इसे पढ़ने के बाद तो आप समझ ही गए होंगे कि आखिर एक लड़की वृंदा वास्तव में तुलसी का पौधा कैसे बनी.

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